मनुष्य की सबसे पुरानी आदत है किसी भी अनुभव को तुरंत समझ लेना।
जो घट रहा है, उसे नाम देना।
जो महसूस हो रहा है, उसे परिभाषित करना।
दुख आया तो कहा गया – यह गलत है।
सुख आया तो कहा गया – यह अच्छा है।
और इसी जल्दी में अनुभव अपने पूरे रूप में कभी जिया ही नहीं गया।
मन ने उसे समझकर छोटा कर दिया।
पर जीवन की कुछ अवस्थाएँ ऐसी होती हैं
जहाँ समझने की ज़रूरत खुद गिर जाती है।
न इसलिए कि समझ आ गई,
बल्कि इसलिए कि समझ अप्रासंगिक हो जाती है।
समझ का बोझ
समझ हल्की नहीं होती।
समझ हमेशा अतीत से आती है।
जो पहले देखा,
जो पहले सीखा,
जो पहले जाना।
मन उसी से तुलना करता है।
और तुलना करते ही अनुभव नया नहीं रहता।
कई बार व्यक्ति बहुत शांत जगह पर बैठा होता है,
सब कुछ ठीक होता है,
फिर भी भीतर बेचैनी रहती है।
क्योंकि मन पूछ रहा होता है –
“ये शांति किस वजह से है?”
“कितनी देर टिकेगी?”
“इसका मतलब क्या है?”
यही प्रश्न शांति को भारी बना देते हैं।
जब अनुभव प्रश्न से पहले घटता है
बहुत कम क्षण ऐसे होते हैं
जब कुछ घटता है
और मन पीछे रह जाता है।
जैसे अचानक किसी शाम का रंग गहरा हो जाए।
या बिना कारण किसी पेड़ को देखकर आँखें ठहर जाएँ।
उस क्षण कोई प्रश्न नहीं उठता।
कोई अर्थ नहीं बनता।
बस कुछ घटता है।
और वही घटित होना
अपने आप में पूरा होता है।
मन बाद में आता है।
और कई बार आता ही नहीं।
अनुभव और मालिक की दूरी
मन हर अनुभव के पीछे मालिक ढूँढता है।
किसके साथ हुआ।
किसने महसूस किया।
पर जब ध्यान से देखा जाए,
तो अनुभव तो होता है,
पर अनुभव करने वाला स्पष्ट नहीं होता।
दुख होता है,
पर दुखी कौन है – यह तुरंत नहीं मिलता।
आनंद आता है,
पर आनंदित कौन है – यह पकड़ में नहीं आता।
यही जगह असहज करती है।
क्योंकि मन को किसी न किसी को पकड़ना होता है।
और जब पकड़ने को कुछ नहीं मिलता,
तो मन असुरक्षित हो जाता है।
असुरक्षा का सौंदर्य
असुरक्षा को हमेशा समस्या समझा गया है।
पर कुछ असुरक्षाएँ ऐसी होती हैं
जो बोझ नहीं, खुलाव होती हैं।
जब भीतर यह स्पष्ट होता है
कि कोई स्थायी नियंत्रक नहीं मिल रहा,
तो एक अजीब हल्कापन आता है।
अब सब कुछ अपने आप घटता दिखने लगता है –
सोचना भी।
रुकना भी।
बोलना भी।
और इसी अपने आप में
एक गहरी सहजता छिपी होती है।
जहाँ निर्णय भी अपनी ज़रूरत खो देते हैं
जीवन भर निर्णयों से पहचान बनी रहती है।
मैंने यह चुना।
मैंने वह छोड़ा।
पर जब अनुभव बिना समझे घटने लगते हैं,
तो निर्णय भी अपनी धार खो देते हैं।
कुछ किया जाता है,
पर करने वाला आगे नहीं आता।
कुछ नहीं किया जाता,
पर टालने वाला भी नहीं मिलता।
यह आलस्य नहीं है।
यह बस हस्तक्षेप का गिर जाना है।
और हस्तक्षेप गिरते ही
जीवन ज़्यादा स्पष्ट दिखने लगता है।
स्पष्टता जो शब्द नहीं माँगती
स्पष्टता हमेशा शब्दों में नहीं आती।
कई बार शब्द स्पष्टता को धुंधला कर देते हैं।
मन सोचता है –
अगर मैं इसे समझा सकूँ,
तो ही यह सही है।
पर सबसे गहरे अनुभव
समझाए नहीं जा सकते।
उन्हें जिया जा सकता है।
या चुपचाप देखा जा सकता है।
और जब देखने की आदत बन जाती है,
तो बोलने की ज़रूरत
धीरे-धीरे कम होती जाती है।
अनुभव का अकेलापन
यहाँ अकेलापन सामाजिक नहीं होता।
कोई साथ है या नहीं – इससे जुड़ा नहीं होता।
यह अकेलापन
पहचान के बिना होने का अकेलापन होता है।
जहाँ न तुम कुछ साबित कर रहे हो।
न कुछ छिपा रहे हो।
बस हो।
शुरुआत में यह खाली लगता है।
फिर धीरे-धीरे
यह खालीपन घर जैसा लगने लगता है।
जहाँ प्रयास भी गिर जाता है
अक्सर आध्यात्मिकता को प्रयास से जोड़ा गया है।
ज़्यादा जागरूक बनो।
ज़्यादा शांत बनो।
पर एक बिंदु पर
हर प्रयास थकाने लगता है।
और उसी थकान में
कुछ ढीला पड़ता है।
न जागरूक बनने की ज़िद रहती है।
न शांत रहने की।
बस जो है,
उसे रहने दिया जाता है।
और उसी अनुमति में
जीवन पहली बार
बिना तनाव के बहता है।
जीवन का साधारण हो जाना
बाहर से कुछ नहीं बदलता।
काम वही रहता है।
लोग वही रहते हैं।
पर भीतर से
जीवन सरल हो जाता है।
समस्याएँ आती हैं।
पर समस्या बनने वाला
कोई नहीं मिलता।
भावनाएँ उठती हैं।
पर उन्हें पकड़ने वाला
कोई हाथ नहीं बनता।
और यही साधारणता
सबसे गहरी आध्यात्मिक स्थिति बन जाती है।
अंत नहीं, बस एक ठहराव
यह कोई उपलब्धि नहीं है।
कोई मंज़िल नहीं है।
यह बस एक ठहराव है,
जहाँ अनुभव को समझने की ज़रूरत नहीं रहती।
जहाँ जीवन को सही या गलत नहीं ठहराया जाता।
जहाँ होना ही पर्याप्त होता है।
और शायद,
यही वो जगह है
जहाँ जीवन पहली बार
अपने पूरे भार के बिना महसूस होता है।
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