वो क्षण जब भीतर कोई बोलने वाला नहीं रहा

ये किसी बड़े हादसे की कहानी नहीं है।ना कोई टूटन।ना कोई चमत्कार। ये उस साधारण क्षण की बात हैजब भीतर से जवाब देने वाला थक गया। अब तक जीवन सवालों से चलता था।कोई कुछ कहता, भीतर जवाब उठता।कोई देखता, भीतर प्रतिक्रिया बनती।कोई परिस्थिति आती, भीतर अर्थ खोजा जाता। पर उस दिनजवाब आने में देर हुई।इतनी … Read more

जब जानने की हड़बड़ी छूटी, जीवन दिखने लगा

ये उस दिन की बात नहीं है जब किसी ने ध्यान करना शुरू किया।ना किसी किताब ने रास्ता दिखाया।ना किसी गुरु की आवाज़ भीतर गूँजी। ये उस समय की बात है जब भीतर ये जल्दबाज़ी ही थक गईकि जीवन को समझना ज़रूरी है। अब तक सब कुछ समझ के सहारे टिका हुआ था।हर अनुभव को … Read more

घड़ी चलती रही और समय रुक गया, वो क्षण जब भीतर कोई समय नहीं था।

शहर हमेशा की तरह जाग रहा था।लोग निकल रहे थे, दुकानें खुल रही थीं, आवाज़ें एक-दूसरे पर चढ़ रही थीं।सब कुछ चल रहा था, पर उस सुबह कुछ अलग था। वो आदमी खिड़की के पास खड़ा था।घड़ी सामने टंगी थी, पर वो उसे नहीं देख रहा था।समय टिक-टिक कर रहा था, पर भीतर कोई टिक-टिक … Read more

हाथ खाली, अहंकार समाप्त – पकड़ का अंत ही मुक्ति की शुरुआत है।

रात जो साधारण नहीं थी वो रात किसी खास वजह से अलग नहीं थी।न आसमान बदला था,न हवा में कोई संदेश था। कमरा वैसा ही था जैसा हर रात होता था।दीवारें, खिड़की, हल्की रोशनी। लेकिन भीतर कुछ बदल गया था।ऐसा नहीं कि कोई बड़ी घटना घटी।ऐसा भी नहीं कि कोई उत्तर मिला। बस इतना हुआ … Read more

सवालों का अंत – यही जागरण है। जहाँ उत्तर नहीं, वहीं अनुभव है।

मनुष्य को हमेशा लगता है कि जीवन किसी उत्तर की तरफ बढ़ रहा है। जैसे कहीं कोई अंतिम समाधान रखा हो, जिसे पा लेने के बाद सब स्पष्ट हो जाएगा। इसी उम्मीद में सवाल पैदा होते हैं। सवालों के साथ खोज चलती है। और खोज के साथ एक बेचैनी भी चलती रहती है। पर कभी-कभी … Read more

जहाँ अनुभव को समझने की ज़रूरत नहीं रहती

मनुष्य की सबसे पुरानी आदत है किसी भी अनुभव को तुरंत समझ लेना।जो घट रहा है, उसे नाम देना।जो महसूस हो रहा है, उसे परिभाषित करना। दुख आया तो कहा गया – यह गलत है।सुख आया तो कहा गया – यह अच्छा है। और इसी जल्दी में अनुभव अपने पूरे रूप में कभी जिया ही … Read more