जब भीतर कोई दिशा माँगना बंद कर देता है

मनुष्य का जीवन अक्सर दिशा की तलाश में बीतता है। कहाँ जाना है, क्या बनना है और किस तरफ बढ़ना सही है-ये प्रश्न भीतर लगातार चलते रहते हैं। बचपन से ही अगला कदम क्या होगा, इस पर ध्यान सिखाया जाता है। पढ़ाई के बाद क्या, काम के बाद क्या और एक लक्ष्य के बाद अगला … Read more

जहाँ भीतर कुछ भी ठीक करने की ज़रूरत नहीं लगती

मनुष्य का जीवन अक्सर सुधार की भावना से चलता है। कुछ ठीक करना है, कुछ बदलना है और कुछ बेहतर बनाना है। बचपन से यही सिखाया जाता है कि जैसे हो, वैसे पर्याप्त नहीं हो। अंक सुधरने चाहिए, आदतें सुधरनी चाहिए, स्वभाव और सोच दोनों सुधरने चाहिए। धीरे-धीरे यह सुधार की भाषा भीतर उतर जाती … Read more

जहाँ कोई प्रयास नहीं, वहीं वास्तविक ठहराव है

मनुष्य आमतौर पर भीतर रुकने की कोशिश करता है। ध्यान के नाम पर, साधना के नाम पर या समझ के नाम पर। वह मान लेता है कि कहीं कोई ऐसी जगह है जहाँ पहुँचते ही सब ठीक हो जाएगा। इसी मान्यता के साथ भीतर भी एक यात्रा शुरू हो जाती है, जिसमें हर दिन कुछ … Read more

जिस दिन साबित करना छोड़ा, जीवन हल्का हो गया

मनुष्य का अधिकांश जीवन खुद को साबित करने में बीत जाता है। कभी दूसरों के सामने, कभी परिस्थितियों के सामने और सबसे ज़्यादा खुद के सामने। भीतर लगातार कुछ वाक्य चलते रहते हैं – मैं सही हूँ, मैं समझदार हूँ, मैं पीछे नहीं हूँ, मैं कम नहीं हूँ। ये बातें ज़्यादातर बोली नहीं जातीं, लेकिन … Read more

जब कुछ भी साबित करने की आवश्यकता समाप्त हो गई

एक समय ऐसा होता है जब मनुष्य का जीवन लगातार साबित करने में बीतता है। खुद को, अपने निर्णयों को, अपने अनुभवों को, अपने दुख को और कभी-कभी अपनी शांति को भी। हर बातचीत के पीछे एक अदृश्य कोशिश रहती है कि सामने वाला समझे, माने और स्वीकार करे। और जब ऐसा नहीं होता, तो … Read more

जिस दिन मौन भारी नहीं लगा, उसी दिन मुक्ति आई

कुछ समय पहले तक मौन भी भारी लगता था। चुप बैठना आसान नहीं था। जैसे ही शब्द रुकते थे, मन बेचैन हो जाता था। ऐसा लगता था कि कुछ छूट रहा है, कुछ कहना ज़रूरी है, जैसे मौन कोई खाली जगह हो जिसे तुरंत भरना चाहिए। शब्द न हों तो भीतर एक असहजता फैल जाती … Read more

जहाँ आत्मा शब्दों से पहले प्रकट होती है – शब्दों से परे की पहचान

कुछ क्षण ऐसे होते हैं जिनके लिए भाषा तैयार नहीं होती। मन शब्द ढूँढने की कोशिश करता है, लेकिन शब्द देर से आते हैं। और जब वे आते भी हैं, तब तक अनुभव उनसे कहीं आगे निकल चुका होता है। ऐसा लगता है जैसे जो घटा है, वह किसी भी वाक्य से पहले ही पूरा … Read more

जीवन को समझने की कोशिश ही जीवन से दूरी थी।

मनुष्य जीवन को समझने की कोशिश में ही जीवन का बड़ा हिस्सा गंवा देता है। हर अनुभव के पीछे एक अर्थ ढूँढा जाता है, हर घटना को किसी निष्कर्ष में बदलने की आदत बना ली जाती है। जैसे जीवन तब तक अधूरा है, जब तक उसे समझ न लिया जाए। इसी समझ के सहारे व्यक्ति … Read more

साधारण दिनों का अचानक गहरा हो जाना

जीवन ज़्यादातर साधारण दिनों से बना होता है। सुबह उठना, काम पर जाना, लोगों से मिलना, शाम होना और फिर रात का आ जाना। इन सबमें कुछ भी असाधारण नहीं लगता और शायद इसी कारण हम इन पलों को सच में देखते भी नहीं। दिन बीतते रहते हैं, पर भीतर कोई विशेष हलचल नहीं होती। … Read more

देखने वाला भी एक परत था – वह भी छूट गई

ये किसी खोज का परिणाम नहीं था, न ध्यान से आया और न ही किसी समझ से निकला। ये उस क्षण घटा जब भीतर देखने वाला भी थोड़ा पीछे हट गया। अब तक ऐसा लगता था कि कोई तो है जो देख रहा है, समझ रहा है, साक्षी बनकर खड़ा है। लेकिन उस रात पहली … Read more