मनुष्य का अधिकांश जीवन खुद को साबित करने में बीत जाता है। कभी दूसरों के सामने, कभी परिस्थितियों के सामने और सबसे ज़्यादा खुद के सामने। भीतर लगातार कुछ वाक्य चलते रहते हैं – मैं सही हूँ, मैं समझदार हूँ, मैं पीछे नहीं हूँ, मैं कम नहीं हूँ। ये बातें ज़्यादातर बोली नहीं जातीं, लेकिन मन के भीतर लगातार दोहराई जाती हैं।
इन्हीं अदृश्य वाक्यों से एक ऐसा तनाव बनता है जो दिखाई नहीं देता, लेकिन हर सांस के साथ मौजूद रहता है। यह तनाव किसी विशेष घटना से नहीं जुड़ा होता, बल्कि लगातार खुद को सही ठहराने की कोशिश से पैदा होता है।
सफलता के बाद भी क्यों खालीपन बचा रहता है
अक्सर यह माना जाता है कि कुछ पा लेने के बाद यह तनाव खत्म हो जाएगा। एक पद मिल जाए, एक पहचान बन जाए, जीवन में थोड़ी स्थिरता आ जाए, तो भीतर का दबाव कम हो जाएगा। लेकिन ऐसा बहुत कम होता है।
जैसे ही कोई लक्ष्य पूरा होता है, भीतर एक नया मापदंड खड़ा हो जाता है। अब इससे आगे क्या, अब और बेहतर क्या किया जा सकता है, अब खुद को कैसे बनाए रखा जाए। समस्या लक्ष्य में नहीं होती, समस्या उस व्यक्ति में होती है जो हर उपलब्धि के बाद खुद को फिर से गढ़ने बैठ जाता है।
खुद को गढ़ने की थकान
बहुत कम लोग इस थकान को पहचान पाते हैं। यह न तो शरीर की थकान होती है और न ही सामान्य मानसिक थकान। यह उस लगातार कोशिश की थकान होती है जिसमें व्यक्ति खुद को किसी रूप में बनाए रखने की कोशिश करता है।
अच्छा बने रहना, समझदार दिखना, संतुलित रहना, सजग रहना। धीरे-धीरे ये सब भूमिकाएँ बन जाती हैं। और हर भूमिका को निभाने में ऊर्जा लगती है। यही ऊर्जा-क्षय भीतर एक गहरी, लेकिन अनदेखी थकान पैदा करता है।
एक क्षण जब भूमिका गिर जाती है
कभी-कभी कोई विशेष घटना नहीं घटती। न कोई बड़ा झटका लगता है और न कोई गहरा आध्यात्मिक अनुभव होता है। बस एक साधारण-सा क्षण आता है जब किसी प्रतिक्रिया के बाद व्यक्ति खुद से पूछ बैठता है – मैं ये सब क्यों कर रहा हूँ।
यह सवाल उत्तर नहीं चाहता और न ही किसी बहस की माँग करता है। यह बस भीतर एक छोटी-सी रुकावट पैदा करता है। और उसी रुकावट में पहली बार भूमिका थोड़ी ढीली पड़ने लगती है।
जब भीतर कोई दर्शक नहीं बचता
आमतौर पर व्यक्ति अपने अनुभवों को देखकर कहता है – मैं देख रहा हूँ, मैं समझ रहा हूँ, मैं महसूस कर रहा हूँ। लेकिन उस क्षण में देखने वाला भी स्पष्ट नहीं रहता।
अनुभव तो हो रहा होता है, लेकिन उसके साथ कोई दावा नहीं जुड़ता। न यह कहा जाता है कि मैं शांत हूँ, न यह कि मैं उलझा हूँ। बस अनुभव होता है। और अनुभव बिना किसी मालिक के भी पूरा लगने लगता है।
समझ का अपने आप पीछे हटना
यहाँ कोई यह निर्णय नहीं लेता कि अब समझ नहीं चाहिए। समझ बस अपने आप पीछे हट जाती है, क्योंकि उसे बुलाया नहीं जा रहा होता।
पहले हर चीज़ को समझने की जल्दी रहती थी। अब किसी चीज़ को अधूरा छोड़ देना भी असहज नहीं लगता। और यह अधूरापन पहली बार खाली नहीं लगता, बल्कि हल्का लगता है।
जहाँ नियंत्रण की ज़रूरत नहीं रहती
इस अवस्था में जीवन बिखरता नहीं। काम होते रहते हैं, रिश्ते चलते रहते हैं और ज़िम्मेदारियाँ निभती रहती हैं। फर्क सिर्फ़ इतना होता है कि भीतर कोई कसाव नहीं रहता कि सब कुछ मेरे ही हाथ में होना चाहिए।
नियंत्रण की ज़रूरत इसलिए नहीं रहती क्योंकि अब कुछ खोने जैसा महसूस नहीं होता। जब खोने का डर ढीला पड़ता है, तो नियंत्रण अपने आप अप्रासंगिक हो जाता है।
पहचान का धीरे से हट जाना
पहचान ऐसे नहीं गिरती जैसे कोई चीज़ टूट जाए। पहचान धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाती है। अब यह साबित करने की ज़रूरत नहीं रहती कि मैं ऐसा हूँ या वैसा हूँ।
कभी कठोरता आ जाती है, कभी नरमी। कभी स्पष्टता होती है, कभी भ्रम। और इनमें से किसी को भी स्थायी बनाने की मजबूरी नहीं रहती। जीवन बहता रहता है, बिना किसी तय लेबल के।
साधारण जीवन का लौट आना
सबसे सुंदर बदलाव यही होता है कि साधारण जीवन फिर से दिखने लगता है। बिना किसी ऊँचाई के और बिना किसी गिरावट के। दिन आता है, दिन जाता है और उसके बीच जीवन घटता रहता है।
अब हर क्षण को अर्थ देने की हड़बड़ी नहीं होती, फिर भी जीवन फीका नहीं लगता। साधारण में ही पर्याप्त गहराई दिखाई देने लगती है।
जहाँ कुछ भी जोड़ना नहीं पड़ता
यहाँ व्यक्ति कुछ जोड़ता नहीं। न ज्ञान, न पहचान और न कोई सिद्धांत। और यही सबसे बड़ी राहत बन जाती है।
क्योंकि जोड़ते-जोड़ते ही बोझ बना था। अब बस जो है, वही पर्याप्त लगता है।
अंत नहीं, बस एक ठहराव
यह कोई अंत नहीं है, न कोई उपलब्धि और न कोई विशेष अवस्था। यह बस एक ठहराव है जहाँ भीतर कुछ साबित करने की इच्छा चुप हो जाती है।
और उसी चुप्पी में जीवन पहली बार बिना किसी दबाव के पूरा लगता है। न बेहतर, न बदतर। बस हल्का।