मनुष्य जीवन को समझने की कोशिश में ही जीवन का बड़ा हिस्सा गंवा देता है। हर अनुभव के पीछे एक अर्थ ढूँढा जाता है, हर घटना को किसी निष्कर्ष में बदलने की आदत बना ली जाती है। जैसे जीवन तब तक अधूरा है, जब तक उसे समझ न लिया जाए। इसी समझ के सहारे व्यक्ति खुद को सुरक्षित महसूस करता है।
लेकिन एक बिंदु ऐसा भी आता है जब यह पूरी कोशिश अचानक अप्रासंगिक लगने लगती है। न इसलिए कि सब समझ में आ गया, बल्कि इसलिए कि समझने की ज़रूरत ही ढीली पड़ जाती है। जीवन वहीं रहता है, पर उसे पकड़ने की जल्दबाज़ी गिर जाती है।
समझने की आदत कैसे बनती है
समझने की आदत बचपन से ही बननी शुरू हो जाती है। पूछना सिखाया जाता है, हर चीज़ के पीछे कारण खोजने की ट्रेनिंग दी जाती है। क्यों हुआ, कैसे हुआ, इसका मतलब क्या है। धीरे-धीरे हर अनुभव के साथ एक सवाल जुड़ जाता है।
ये अच्छा था या बुरा, ये मेरे पक्ष में था या खिलाफ, इससे मुझे क्या सीख मिली। समझ सुरक्षा देती है, क्योंकि जिसे समझ लिया जाए उससे डर कम लगता है। और जो समझ में न आए, वही असहज करता है। इसी कारण मन हर हाल में किसी न किसी तरह की समझ बनाना चाहता है।
समझ का बोझ
समय के साथ यही समझ बोझ बन जाती है। क्योंकि अब हर नई स्थिति और हर नया अनुभव एक नई व्याख्या माँगने लगता है। कोई चुप रहा तो उसके पीछे कारण खोजा गया, कोई बदल गया तो वजह ढूँढी गई, कोई रिश्ता टूटा तो उसका अर्थ बनाया गया।
धीरे-धीरे जीवन घटनाओं का सहज प्रवाह नहीं रहता, बल्कि विश्लेषण का मैदान बन जाता है। और जैसे-जैसे विश्लेषण बढ़ता है, जीवन उतना ही दूर और भारी लगने लगता है।
एक अजीब सा थक जाना
फिर एक दिन ऐसा आता है जब मन समझते-समझते थक जाता है। यह थकान न शारीरिक होती है और न ही केवल मानसिक। यह उस ढाँचे की थकान होती है जो हर चीज़ को अर्थ में बदलता रहा।
उस दिन कोई बड़ा सवाल नहीं उठता और न ही कोई गहरी निराशा होती है। बस भीतर से एक सादा-सी अनुभूति आती है कि अब समझना ज़रूरी नहीं लग रहा।
जब सवाल अपने आप गिरने लगते हैं
पहले हर अनुभव के साथ सवाल उठता था। अब अनुभव आता है, लेकिन सवाल नहीं उठता। दुख आता है, पर यह पूछने की ज़रूरत नहीं लगती कि क्यों आया। खुशी आती है, पर यह जानने की जल्दी नहीं रहती कि कब तक रहेगी।
यह कोई उदासीनता नहीं होती और न ही संवेदनहीनता। यह बस सवालों की अनुपस्थिति होती है, जहाँ अनुभव अपने आप पूरा महसूस होने लगता है।
समझ और जीवन के बीच की दूरी
समझ हमेशा जीवन के बाद आती है। पहले घटना होती है, फिर विचार आता है और फिर समझ बनती है। लेकिन जब समझ ही जीवन का केंद्र बन जाए, तो जीवन खुद पीछे छूट जाता है।
जब यह साफ़ दिखने लगता है, तो एक गहरी स्पष्टता आती है कि जीवन को समझने की कोशिश ही जीवन से दूरी बना रही थी। और यह दूरी अब स्वीकार्य नहीं लगती।
अनुभव का सीधे होना
जब समझ अप्रासंगिक हो जाती है, तब अनुभव सीधे होने लगता है। अब अनुभव को नाम देना ज़रूरी नहीं लगता और न ही उसे किसी खांचे में डालने की ज़रूरत रहती है।
बारिश गिरती है और बस गिरती है। कोई भावना उठती है और बस उठती है। बीच में कोई व्याख्याकार खड़ा नहीं होता। और बिना व्याख्या के अनुभव ज़्यादा जीवंत और सच्चा लगता है।
नियंत्रण का ढीला पड़ना
समझ नियंत्रण का एक साधन होती है। जिसे समझ लिया जाए, उसे संभालना आसान लगता है। लेकिन जब समझ अप्रासंगिक होती है, तो नियंत्रण भी अपने आप ढीला पड़ने लगता है।
यह डरावना नहीं होता, क्योंकि अब नियंत्रण की ज़रूरत भी महसूस नहीं होती। जीवन अपने ढंग से बह रहा होता है और उस बहाव के साथ चलना आसान लगने लगता है।
पहचान का हल्का होना
समझ के साथ पहचान भी जुड़ी होती है। मैं ऐसा हूँ क्योंकि मैंने ये समझा है, मैं वैसा नहीं हूँ क्योंकि मैंने वो जाना है। जब समझ का महत्व घटता है, पहचान भी हल्की पड़ जाती है।
नाम बना रहता है और भूमिकाएँ भी बनी रहती हैं, लेकिन भीतर उनसे चिपकाव कम हो जाता है। अब खुद को किसी निष्कर्ष में बंद करने की ज़रूरत नहीं रहती।
अपूर्णता का स्वीकार
समझ अप्रासंगिक होने का मतलब यह नहीं कि सब कुछ स्पष्ट हो गया। असल में इसके उल्टा होता है। अब यह स्वीकार हो जाता है कि जीवन को पूरी तरह समझा नहीं जा सकता।
और यह स्वीकार भारी नहीं लगता, बल्कि हल्का लगता है। क्योंकि अब अधूरापन कोई समस्या नहीं रह जाता।
ज्ञान और स्पष्टता का अंतर
ज्ञान जमा किया जा सकता है और समझ बनाई जा सकती है। लेकिन स्पष्टता कुछ और होती है। वह इसी क्षण में होती है।
जब समझ पीछे हटती है, स्पष्टता सामने आती है। अब चीज़ें वैसी ही दिखती हैं जैसी हैं। न बेहतर, न बदतर। बस जैसी हैं।
समय के साथ बदला हुआ रिश्ता
पहले समय को समझना ज़रूरी लगता था। अतीत का अर्थ और भविष्य की योजना। अब समय बस घटता है।
घड़ी चलती है, लेकिन जल्दी नहीं लगती। क्षण पूरे होते हैं और उनका पूरा होना ही पर्याप्त लगता है।
कोई निष्कर्ष न निकालने की स्वतंत्रता
अब हर अनुभव से कुछ सीख निकालना ज़रूरी नहीं लगता। हर गलती को किसी पाठ में बदलने की मजबूरी नहीं रहती।
कभी-कभी अनुभव बस अनुभव रह जाता है। और यही सबसे बड़ी स्वतंत्रता होती है।
जहाँ जीवन फिर से सरल हो जाता है
समझ की भीड़ हटते ही जीवन सरल लगने लगता है। सरल का मतलब आसान नहीं, सरल का मतलब साफ़।
अब चीज़ें उतनी उलझी नहीं लगतीं, क्योंकि उलझनें ज़्यादातर समझ से ही आती थीं।
समापन
जब जीवन को समझना अप्रासंगिक हो जाता है, तब जीवन खत्म नहीं होता। तब जीवन शुरू होता है। शब्दों के बिना, व्याख्या के बिना और निष्कर्ष के बिना।
बस जैसा है, वैसा। और शायद यही सबसे गहरी अवस्था है, जहाँ जीवन को पकड़ा नहीं जाता, समझा नहीं जाता और बदला नहीं जाता। बस जिया जाता है।