ये किसी खोज का परिणाम नहीं था, न ध्यान से आया और न ही किसी समझ से निकला। ये उस क्षण घटा जब भीतर देखने वाला भी थोड़ा पीछे हट गया। अब तक ऐसा लगता था कि कोई तो है जो देख रहा है, समझ रहा है, साक्षी बनकर खड़ा है। लेकिन उस रात पहली बार ये एहसास हुआ कि देखने वाला भी थक सकता है, और जब वो थकता है तो बिना कुछ किए ही पीछे हट जाता है।
यह कोई उपलब्धि नहीं थी और न ही कोई विशेष अनुभव। बस एक साधारण-सा घटित होना था, जिसमें भीतर मौजूद उस सतत निगरानी ने खुद को थोड़ी देर के लिए ढीला छोड़ दिया।
देखने की आदत और उसका बोझ
आमतौर पर देखने को हल्का और मुक्त करने वाला माना जाता है, लेकिन लगातार देखना भी एक बोझ बन सकता है। हर भावना को देखना, हर विचार को पहचानना, हर प्रतिक्रिया पर सजग रहना धीरे-धीरे एक आंतरिक अनुशासन में बदल जाता है। यह अनुशासन दिखने में सही लगता है, पर समय के साथ भीतर थकान पैदा करता है।
जब हर पल कुछ न कुछ देखने की ज़िम्मेदारी बनी रहती है, तो देखने वाला भी एक कर्ता बन जाता है। और जहाँ कर्ता है, वहाँ थकान आना स्वाभाविक है। उसी थकान में एक दिन देखने की आदत भी ढीली पड़ जाती है।
वो क्षण जब देखने की ज़रूरत नहीं लगी
उस समय कोई बड़ा अनुभव नहीं हुआ, न कोई विशेष शांति उतरी। बस इतना हुआ कि कुछ भी देखने की ज़रूरत नहीं लगी। विचार आए और चले गए, भावनाएँ उठीं और ढीली पड़ गईं, लेकिन उनके साथ कोई टिप्पणी नहीं जुड़ी।
न ये कहा गया कि ये अच्छा है, न ये कि ये बाधा है। बस आना और जाना था। पहली बार ऐसा लगा कि बिना देखे भी सब अपने आप घट सकता है और उसमें कोई कमी नहीं आती।
पहली बार बिना स्थिति के होना
आमतौर पर जीवन किसी न किसी स्थिति में महसूस होता है। कभी लगता है मैं दुखी हूँ, कभी शांत हूँ, कभी उलझा हुआ हूँ। लेकिन उस समय कोई स्थिति नहीं थी। न अच्छा, न बुरा, न सही, न गलत।
और बिना किसी स्थिति के होना अजीब तरह से पूरा लग रहा था। ऐसा नहीं कि कुछ खाली था, बल्कि ऐसा कि कुछ जोड़ने की ज़रूरत ही नहीं थी।
मन की हलचल और उसकी सीमाएँ
मन ने स्वाभाविक रूप से फिर से पकड़ बनाने की कोशिश की। उसने कहा कि कुछ तो समझो, कुछ तो तय करो। लेकिन तय करने के लिए कुछ बचा ही नहीं था, क्योंकि तय करने वाला ढाँचा ही ढीला पड़ चुका था।
जब मन की पुरानी संरचनाएँ काम नहीं करतीं, तब प्रयास अपने आप गिर जाता है। वहाँ कोई संघर्ष नहीं होता, बस सीमाएँ दिखने लगती हैं।
जहाँ अनुभव भी दावा नहीं करता
अब अनुभव भी खुद को विशेष नहीं मान रहे थे। पहले अनुभव जैसे कहते थे कि मुझे देखो, मुझे समझो, मुझे याद रखो। अब अनुभव बस घट रहे थे, बिना कोई कहानी बनाए।
और बिना कहानी के भी जीवन अधूरा नहीं लग रहा था। बल्कि अनुभव पहले से ज़्यादा सीधे और सरल लगने लगे थे।
स्वयं की उपस्थिति बिना पहचान के
अजीब बात ये थी कि स्वयं की उपस्थिति बनी रही, लेकिन पहचान नहीं थी। न कोई नाम, न कोई भूमिका। फिर भी जीवन रुका नहीं, बल्कि पहली बार बिना अभिनय के चलने लगा।
जहाँ भूमिका गिरती है, वहाँ सहजता अपने आप आ जाती है। कुछ साबित करने का भार हटते ही हल्कापन अपने आप प्रकट हो जाता है।
दुनिया जो अब सरल लगने लगी
बाहर की दुनिया वही थी। लोग वही थे, काम वही थे। फर्क सिर्फ़ इतना था कि अब उन पर अर्थ चिपकाने की जल्दी नहीं थी। कोई कठिन नहीं था, कोई आसान नहीं था।
जो था, वो बस था। और यही साधारणता पहले से कहीं ज़्यादा स्पष्ट लग रही थी।
निर्णय जो अब भारी नहीं थे
निर्णय अब भी होते थे, लेकिन उनमें बोझ नहीं था। क्योंकि अब निर्णय से पहचान नहीं जुड़ती थी। पहले हर निर्णय खुद को साबित करता था, अब निर्णय सिर्फ़ स्थिति का उत्तर बन गया था।
और जब निर्णय पहचान से मुक्त हो जाएँ, तो उनमें तनाव नहीं बचता।
जहाँ नियंत्रण अपने आप गिरा
नियंत्रण छोड़ा नहीं गया, नियंत्रण अपने आप गिर गया। इसलिए नहीं कि कोई समझ आ गई, बल्कि इसलिए कि नियंत्रण थक गया। और जब थकान आती है, तो छोड़ना नहीं पड़ता, चीज़ें खुद छूट जाती हैं।
यही गिरना सबसे स्वाभाविक होता है, बिना किसी प्रयास के।
समय का बदलता अनुभव
समय अब भी चल रहा था, घड़ी अब भी चलती थी, दिन बीतते थे। लेकिन भीतर कोई दौड़ नहीं थी। और बिना दौड़ के समय दुश्मन नहीं लगता।
जब जल्दी गिर जाती है, तो समय बोझ नहीं बनता, बल्कि एक सहज प्रवाह बन जाता है।
आध्यात्मिकता का शांत पक्ष
यहाँ कोई ऊँचाई नहीं थी, कोई सिद्धि नहीं थी। आध्यात्मिकता किसी विशेष अनुभव की तरह नहीं आई। वो बस जीवन की सामान्यता में घुल गई।
और शायद यही उसका सबसे शांत और सच्चा रूप था।
जहाँ प्रश्न भी ज़रूरी नहीं रहे
अब प्रश्न पूछना आवश्यक नहीं था। इसलिए नहीं कि उत्तर मिल गया, बल्कि इसलिए कि प्रश्न का भार गिर गया। और बिना भार के जीवन पहले से कहीं हल्का लगने लगा।
अंत जो कोई घोषणा नहीं करता
ये लेख किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता, क्योंकि निष्कर्ष तभी बनता है जब कोई दिशा हो। यहाँ कोई दिशा नहीं थी, बस एक सादा अनुभव था।
जब भीतर देखने वाला भी थोड़ा पीछे हट गया, तब जीवन बिना निगरानी के भी पूरा लगने लगा।