मनुष्य को हमेशा लगता है कि जीवन किसी उत्तर की तरफ बढ़ रहा है। जैसे कहीं कोई अंतिम समाधान रखा हो, जिसे पा लेने के बाद सब स्पष्ट हो जाएगा। इसी उम्मीद में सवाल पैदा होते हैं। सवालों के साथ खोज चलती है। और खोज के साथ एक बेचैनी भी चलती रहती है।
पर कभी-कभी एक ऐसा क्षण आता है, जब सवाल पूछते-पूछते मन थक जाता है। सवाल खत्म इसलिए नहीं होते कि उत्तर मिल गया, बल्कि इसलिए कि पूछने वाला ही ढीला पड़ जाता है। उस क्षण कुछ भी स्पष्ट नहीं होता, पर कुछ भी उलझा हुआ भी नहीं लगता।
यही वो जगह है, जहाँ भीतर पहली बार शांति नहीं, बल्कि सन्नाटा उतरता है।
सवालों की थकान
हर सवाल अपने साथ एक मान्यता लेकर आता है। जब कोई पूछता है, तो उसके भीतर पहले से एक दिशा तय होती है। सही क्या है, गलत क्या है। क्या पाना है, क्या छोड़ना है। सवाल कभी खाली नहीं होते। वो हमेशा किसी उम्मीद से जुड़े होते हैं।
पर जब वही सवाल बार-बार लौटते हैं, और हर उत्तर अधूरा लगता है, तब मन धीरे-धीरे थकने लगता है। उसे एहसास होने लगता है कि शायद सवाल ही बोझ हैं। शायद पूछना ही थकाने वाला है।
ये थकान नींद से नहीं जाती। ये थकान समझ की होती है।
जब खोज रुकती है
खोज का रुकना कोई निर्णय नहीं होता। कोई ये तय नहीं करता कि अब नहीं ढूँढूँगा। खोज तब रुकती है, जब भीतर कुछ टूट जाता है। वो टूटना निराशा जैसा नहीं होता। वो बस एक खालीपन होता है, जिसमें आगे बढ़ने की ताकत नहीं बचती।
मन कुछ देर उसी खालीपन से डरता है। क्योंकि अब तक वही चलता आया था। सवाल, योजना, दिशा, लक्ष्य। अब कुछ भी पकड़ में नहीं आता।
पर उसी डर के नीचे एक अजीब सी सहजता भी होती है। जैसे कोई भारी बोझ अचानक नीचे रख दिया गया हो, बिना ये जाने कि अब आगे क्या करना है।
उत्तर के बिना रहना
उत्तर के बिना रहना मन को सबसे ज़्यादा असहज करता है। क्योंकि उत्तर सुरक्षा देता है। उत्तर कहता है, तुम सही रास्ते पर हो। उत्तर पहचान देता है।
पर जब उत्तर नहीं होते, तब पहचान भी ढीली पड़ने लगती है। अब ये साफ़ नहीं रहता कि मैं कौन हूँ, क्या चाहता हूँ, किस दिशा में जा रहा हूँ।
पहले ये स्थिति डरावनी लगती है। पर धीरे-धीरे कुछ और दिखने लगता है। कि शायद ये साफ़ न होना कोई समस्या नहीं है। शायद साफ़ होने की ज़िद ही समस्या थी।
अनिश्चितता का नया स्वाद
अनिश्चितता को अब तक कमजोरी माना गया था। कुछ न पता होना, कुछ तय न होना। पर जब भीतर कोई जवाब नहीं बचता, तब अनिश्चितता एक नया रूप लेती है।
अब वो खालीपन डर नहीं देता। अब वो खुलापन बन जाता है। जहाँ हर क्षण नया है, बिना तुलना के, बिना योजना के।
जीवन पहली बार भविष्य से मुक्त होकर घटने लगता है। घटनाएँ आती हैं, प्रतिक्रियाएँ होती हैं, पर कोई निष्कर्ष नहीं बनता।
और बिना निष्कर्ष के जीना, अजीब तरह से हल्का होता है।
जहाँ नियंत्रण गिर जाता है
उत्तर हमेशा नियंत्रण से जुड़े होते हैं। अगर मुझे पता है, तो मैं संभाल सकता हूँ। अगर मुझे समझ आ गई, तो मैं तय कर सकता हूँ।
पर जब कोई उत्तर नहीं बचता, तब नियंत्रण अपने आप गिर जाता है। न इसलिए कि किसी ने छोड़ा, बल्कि इसलिए कि पकड़ने को कुछ नहीं रहा।
जीवन अब योजना नहीं लगता। वो बस एक बहाव जैसा लगता है, जिसमें विरोध की ज़रूरत नहीं पड़ती।
काम होते हैं। शब्द बोले जाते हैं। फैसले भी होते हैं। पर भीतर कोई कर्ता नहीं बैठा होता।
अनुभव बिना नाम के
पहले हर अनुभव को नाम दिया जाता था। अच्छा, बुरा, सही, गलत। हर चीज़ का वर्गीकरण होता था।
अब अनुभव वैसे ही आते हैं, जैसे हैं। बिना नाम के। दुख दुख नहीं लगता, सुख सुख नहीं लगता। बस कुछ घटता है।
और इसी बिना नाम के अनुभव में एक गहराई होती है। क्योंकि नाम हटते ही तुलना हट जाती है। तुलना हटते ही संघर्ष ढीला पड़ जाता है।
जीवन अब हल नहीं माँगता। वो बस देखा जाना चाहता है।
जब भीतर कोई केंद्र नहीं मिलता
बहुत खोजने के बाद ये स्पष्ट होता है कि भीतर कोई स्थायी केंद्र नहीं है। कोई बैठा हुआ मालिक नहीं है, जो सब चला रहा हो।
घटनाएँ हो रही हैं। विचार आ रहे हैं। भावनाएँ उठ रही हैं। पर इनके पीछे कोई ठोस “मैं” नहीं मिलता।
पहले ये बात डरावनी लगती है। क्योंकि अब तक उसी “मैं” के सहारे सब समझा गया था।
पर जैसे-जैसे देखा जाता है, वैसे-वैसे ये डर भी ढीला पड़ जाता है। क्योंकि बिना केंद्र के भी जीवन चल रहा है। शायद पहले से ज़्यादा सहज।
स्पष्टता जो चुप होती है
यहाँ कोई बड़ी घोषणा नहीं होती। कोई विशेष अनुभव नहीं, जिसे शब्दों में बाँधा जाए।
बस इतना साफ़ होता है कि अब कुछ साबित करने की ज़रूरत नहीं है। न खुद को, न किसी और को।
स्पष्टता अब बोलती नहीं। वो बस मौजूद रहती है। जैसे रोशनी, जो कुछ कहती नहीं, बस दिखा देती है।
अंत जो अंत नहीं है
ये कोई मंज़िल नहीं है। न ही कोई उपलब्धि। यहाँ पहुँचने जैसा कुछ नहीं हुआ।
बस इतना हुआ कि भीतर सवाल थक गए। और उनके साथ वो बेचैनी भी, जो जीवन को लगातार अधूरा बनाए रखती थी।
अब जीवन पूरा नहीं लगा। पर अधूरा भी नहीं लगा।
बस घटता रहा।
और शायद यही सबसे गहरी बात थी।
कि जब भीतर कोई जवाब नहीं बचा, तब पहली बार जीवन ने सवाल पूछना बंद कर दिया।