रात जो साधारण नहीं थी
वो रात किसी खास वजह से अलग नहीं थी।
न आसमान बदला था,
न हवा में कोई संदेश था।
कमरा वैसा ही था जैसा हर रात होता था।
दीवारें, खिड़की, हल्की रोशनी।
लेकिन भीतर कुछ बदल गया था।
ऐसा नहीं कि कोई बड़ी घटना घटी।
ऐसा भी नहीं कि कोई उत्तर मिला।
बस इतना हुआ कि
कुछ भी पकड़ने लायक नहीं लगा।
थकान जो शरीर की नहीं थी
दिन भर काम किया गया था।
शरीर थका था, पर वो थकान जानी-पहचानी थी।
जो नई थकान थी,
वो सोच की थी।
हर विचार जैसे अपना वजन खो चुका था।
हर निष्कर्ष अधूरा लग रहा था।
पहले मन चीज़ों को थामता था।
योजनाएँ, पहचान, भविष्य।
अब हाथ खाली थे।
और खाली हाथ
पहली बार भारी नहीं लग रहे थे।
जब मन सवाल बनाना भूल गया
सालों से मन सवालों पर जीता आया था।
मैं कौन हूँ।
मुझे क्या करना चाहिए।
ये सही है या गलत।
पर उस रात
कोई सवाल नहीं उठा।
ऐसा नहीं कि सब समझ में आ गया।
बल्कि इसलिए कि
समझने की आदत ही थक गई थी।
मन कुछ पूछना चाहता था,
पर पूछने के लिए शब्द नहीं मिले।
और बिना सवाल के
पहली बार शांति नहीं,
बल्कि सन्नाटा उतरा।
सन्नाटा जो डराता नहीं
अक्सर सन्नाटा डराता है।
क्योंकि वहाँ मन को सहारा नहीं मिलता।
पर ये सन्नाटा अलग था।
इसमें कोई खालीपन नहीं था।
जैसे कमरे से फालतू सामान हट गया हो,
और अब जगह साफ दिख रही हो।
कुछ भी नया नहीं आया।
बस पुराना शोर चला गया।
यादें जो आदेश नहीं देतीं
यादें आईं।
पर इस बार वो दिशा नहीं दे रही थीं।
पहले हर याद कहती थी
ऐसा मत करना।
ऐसा पहले हुआ था।
अब यादें बस मौजूद थीं।
बिना सलाह,
बिना चेतावनी।
पहली बार अतीत
मार्गदर्शक नहीं बना।
और भविष्य
प्रतीक्षा में खड़ा नहीं था।
जब समय ढीला पड़ गया
घड़ी चल रही थी।
पर समय का दबाव नहीं था।
मिनट बीत रहे थे,
पर किसी ओर नहीं जा रहे थे।
जैसे समय भी थक गया हो
भागते-भागते।
उस क्षण समझ आया
कि जल्दी हमेशा भविष्य से आती है।
और जब भविष्य चुप हो जाए,
तो वर्तमान भारी नहीं रहता।
पहचान की अनुपस्थिति
नाम याद था।
चेहरा पहचाना जा सकता था।
पर अंदर कोई ऐसा बिंदु नहीं था
जो कहे
मैं यही हूँ।
पहचान गायब नहीं हुई थी।
बस अप्रासंगिक हो गई थी।
जैसे किसी पुराने दस्तावेज़ की तरह
जो अब इस्तेमाल में नहीं।
भावनाएँ जो गुजर गईं
डर आया।
पर रुका नहीं।
खुशी की हल्की लहर आई।
पर टिक नहीं पाई।
दुख की छाया भी आई।
पर बोझ नहीं बनी।
क्योंकि अब कोई पकड़ नहीं थी।
भावनाएँ मेहमान थीं,
मालिक नहीं।
जब प्रयास भी अनावश्यक लगा
कभी मन कहता था
शांत रहो।
सजग रहो।
बेहतर बनो।
उस रात
कोई प्रयास नहीं था।
न सुधारने की चाह।
न बदलने की योजना।
बस जो है,
वो बिना हस्तक्षेप के।
और इसी में
एक अजीब सी स्पष्टता थी।
जीवन जो बिना केंद्र के चलता रहा
पहले लगता था
कोई है जो सब संभाल रहा है।
अब देखा गया
कि जीवन अपने आप घट रहा है।
साँस चल रही है।
दिल धड़क रहा है।
विचार आ रहे हैं।
पर इनके पीछे
कोई ठोस संचालक नहीं मिला।
और ये बात डरावनी नहीं थी।
ये हल्की थी।
सुबह जो अलग नहीं थी
सुबह हुई।
रोशनी वही थी।
आवाज़ें वही थीं।
पर देखने का ढंग बदल चुका था।
लोग बोल रहे थे।
काम चल रहा था।
पर भीतर कोई जल्दी नहीं थी।
कोई साबित करने की ज़रूरत नहीं थी।
बाहर का संसार सरल क्यों लगने लगा
दुनिया बदली नहीं थी।
पर अब उससे लड़ने की आदत नहीं रही।
कोई बात सही लगे या गलत,
ये तय करना ज़रूरी नहीं लगा।
घटनाएँ हो रही थीं।
और देखी जा रही थीं।
बिना निर्णय,
बिना पक्ष।
जहाँ अर्थ लगाने की मजबूरी खत्म हुई
पहले हर चीज़ का मतलब चाहिए था।
ये क्यों हुआ।
इसका संकेत क्या है।
अब कई चीज़ें
बिना अर्थ के भी पूरी लगने लगीं।
और बिना अर्थ के
पूर्ण होना
मन के लिए सबसे कठिन
और चेतना के लिए सबसे स्वाभाविक था।
कोई निष्कर्ष नहीं
इस अनुभव से कोई सिद्धांत नहीं निकला।
कोई नियम नहीं बना।
बस इतना साफ हुआ
कि जीवन को समझना ज़रूरी नहीं।
उसे देखना काफी है।
अंत जो शुरुआत नहीं बनता
ये कहानी किसी समाधान पर खत्म नहीं होती।
क्योंकि समाधान वहाँ चाहिए
जहाँ समस्या मानी जाती है।
यहाँ समस्या नहीं गिरी।
बस पकड़ ढीली पड़ी।
और जब पकड़ ढीली पड़ती है,
तो जीवन अपने आप
हल्का हो जाता है।