वो क्षण जब भीतर कोई बोलने वाला नहीं रहा

ये किसी बड़े हादसे की कहानी नहीं है।
ना कोई टूटन।
ना कोई चमत्कार।

ये उस साधारण क्षण की बात है
जब भीतर से जवाब देने वाला थक गया।

अब तक जीवन सवालों से चलता था।
कोई कुछ कहता, भीतर जवाब उठता।
कोई देखता, भीतर प्रतिक्रिया बनती।
कोई परिस्थिति आती, भीतर अर्थ खोजा जाता।

पर उस दिन
जवाब आने में देर हुई।
इतनी देर
कि सवाल ही ढीला पड़ गया।


जवाब जो आदत बन चुके थे

जवाब कभी समस्या नहीं थे।
जवाब तो व्यवस्था थे।

बचपन से सिखाया गया
कैसे उत्तर देना है।
क्या सही है।
क्या गलत है।

धीरे-धीरे हर स्थिति
एक प्रश्न बन गई।
और हर प्रश्न
एक उत्तर माँगने लगा।

जवाब देने से
पहचान सुरक्षित रहती थी।

अब जवाब न आने पर
पहचान हिलने लगी।


पहली बार चुप्पी असहज लगी

जब किसी ने पूछा
और भीतर कुछ नहीं उठा,
तो घबराहट हुई।

ऐसा लगा
जैसे कुछ छूट गया हो।

मन ने कहा
सोचो।
निर्णय लो।
कुछ तो कहो।

पर कुछ भी बन नहीं पाया।

चुप्पी पहली बार
खाली नहीं लगी,
पर अनजानी लगी।


जहाँ शब्द बनने से पहले गिर गए

शब्दों के बनने की एक प्रक्रिया होती है।
विचार।
तुलना।
स्मृति।
अनुभव।

पर उस दिन
प्रक्रिया बीच में ही रुक गई।

विचार उठा,
पर आगे नहीं बढ़ा।

स्मृति आई,
पर जुड़ नहीं पाई।

शब्द बनने से पहले ही
ढह गए।

और बिना शब्दों के
स्थिति अधूरी नहीं लगी।


मन की बेचैनी का असली कारण

बेचैनी इसलिए नहीं थी
कि उत्तर नहीं था।

बेचैनी इसलिए थी
क्योंकि अब तक
उत्तर ही सहारा थे।

उत्तर से पता चलता था
मैं कहाँ खड़ा हूँ।

अब जब उत्तर नहीं,
तो खड़े होने की जगह भी
साफ़ नहीं थी।

और ये जगह
मन के लिए सबसे कठिन होती है।


स्थिति जो बिना नाम के पूरी थी

पहले हर अनुभव
नाम माँगता था।

दुख।
सुख।
भय।
आशा।

अब अनुभव
बस अनुभव थे।

ना उन्हें सुधारना था।
ना उनसे भागना था।
ना उन्हें पकड़ना था।

और बिना नाम के भी
अनुभव अधूरे नहीं थे।


जब प्रतिक्रिया का ढाँचा गिरा

किसी ने तीखा कहा।
पहले भीतर बचाव उठता था।

अब तीखापन आया,
पर बचाव नहीं।

किसी ने सराहा।
पहले भीतर गर्व उठता था।

अब शब्द आए,
पर पकड़ नहीं बनी।

ये कोई संयम नहीं था।
ये कोई अभ्यास नहीं था।

ये बस
प्रतिक्रिया का ढाँचा
अपने आप ढीला पड़ गया था।


अजीब स्वतंत्रता

अब कुछ करने की स्वतंत्रता नहीं मिली।
अब कुछ न करने की स्वतंत्रता मिली।

ये स्वतंत्रता रोमांचक नहीं थी।
ये शांत थी।

ऐसी शांति
जिसमें कोई उपलब्धि नहीं थी।

बस
एक गहरी सहजता।


समय जो अब आदेश नहीं देता

समय अब भी चल रहा था।
घड़ी अब भी टिक-टिक कर रही थी।

पर भीतर
कोई धक्का नहीं था।

ना जल्दी।
ना देरी।

काम होते थे।
निर्णय होते थे।

पर उनके पीछे
कोई दबाव नहीं था।


जहाँ समझ भी थक जाती है

पहले हर चीज़ समझनी थी।
अब समझने की थकान दिखने लगी।

क्यों समझना है।
किसलिए समझना है।

और इस प्रश्न का
कोई बौद्धिक उत्तर नहीं था।

बस इतना दिखा
कि समझ भी एक आदत थी।

और हर आदत
एक दिन थकती है।


आध्यात्मिकता जो कुछ जोड़ती नहीं

यहाँ कोई नई धारणा नहीं जुड़ी।
कोई सिद्धांत नहीं बना।

बल्कि
जो-जो जुड़ा हुआ था,
वो अपने आप गिरता गया।

धारणा।
परिभाषा।
पहचान।

और जब ये सब गिरा,
तो भीतर कुछ नया नहीं आया।

बस
जो था
वो बिना बाधा के
दिखने लगा।


स्वयं का न मिलना

अब स्वयं को खोजने का आग्रह नहीं रहा।

क्योंकि ये साफ़ हुआ
कि जिसे खोजा जा रहा था,
वो कभी वस्तु था ही नहीं।

और जो वस्तु नहीं,
उसे पाया नहीं जा सकता।

ये बात
ज्ञान की तरह नहीं आई।

ये बस
एक सादे अनुभव की तरह आई।


जहाँ केंद्र ढूँढने की ज़रूरत नहीं

पहले लगता था
कि भीतर कोई केंद्र होना चाहिए।

कोई संचालक।
कोई निर्णयकर्ता।

अब केंद्र ढूँढने की ज़रूरत नहीं रही।

घटनाएँ होती हैं।
अनुभव आते हैं।
क्रियाएँ चलती हैं।

और बिना केंद्र के भी
जीवन बिखर नहीं रहा।


संबंध जो हल्के हो गए

अब लोगों से मिलना
कम नहीं हुआ।

पर मिलते समय
कुछ साबित करने की जल्दी नहीं रही।

ना सही दिखने की।
ना समझदार दिखने की।

और बिना दिखावे के
संबंध ज़्यादा सच्चे लगने लगे।


जहाँ प्रयास अपने आप गिर गया

अब जागरूक रहने की कोशिश नहीं थी।
शांत रहने की कोशिश नहीं थी।

और बिना कोशिश के भी
अक्सर शांति रहती थी।

ये विरोधाभास नहीं था।
ये बस
प्रयास की अनुपस्थिति थी।


अंत जो कोई निष्कर्ष नहीं देता

ये लेख किसी सीख पर खत्म नहीं होता।
कोई संदेश नहीं देता।

बस एक दृश्य छोड़ता है।

जब भीतर
जवाब देने वाला थक जाता है,
तो जीवन
पहली बार
बिना स्पष्टीकरण के
पूरा लगने लगता है।

और शायद
यही वो जगह है
जहाँ जीवन
अपने असली स्वर में
सुनाई देता है।

बिना शोर के।
बिना घोषणा के।


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