कुछ समय पहले तक मौन भी भारी लगता था। चुप बैठना आसान नहीं था। जैसे ही शब्द रुकते थे, मन बेचैन हो जाता था। ऐसा लगता था कि कुछ छूट रहा है, कुछ कहना ज़रूरी है, जैसे मौन कोई खाली जगह हो जिसे तुरंत भरना चाहिए। शब्द न हों तो भीतर एक असहजता फैल जाती थी।
लेकिन एक दिन ऐसा आया जब मौन बोझ नहीं रहा। न इसलिए कि उसे साध लिया गया था और न ही इसलिए कि कोई अभ्यास पूरा हो गया था। बस भीतर से भरने की जल्दी ही गिर गई। और जब जल्दी गिरी, तो मौन अपने आप हल्का हो गया।
शोर से नहीं, दबाव से थकान आती है
मनुष्य शोर से नहीं थकता। असली थकान आती है खुद को लगातार समझाने से, सही ठहराने से और हर स्थिति में खुद को बचाने से। दिन भर शब्द चलते रहते हैं। बातें, विचार, योजनाएँ और यादें। लेकिन थकान वहाँ पैदा होती है जहाँ हर क्षण कुछ न कुछ बनते रहना पड़ता है।
मौन इस थकान के सामने आईने की तरह खड़ा हो जाता है। इसलिए शुरुआत में मौन डराता है। क्योंकि वहाँ कोई भूमिका नहीं होती, कोई बहाना नहीं होता और कोई आवरण नहीं बचता।
मौन से डर क्यों लगता है
मौन में कोई पहचान पकड़ में नहीं आती। न बोलने वाला होता है, न समझाने वाला और न ही साबित करने वाला। मौन में पहचान को सहारा नहीं मिलता। और जब पहचान अकेली पड़ती है, तो घबराहट पैदा होती है।
इसीलिए लोग मौन से भागते हैं। फोन खोल लेते हैं, किसी से बात कर लेते हैं, कुछ न कुछ चालू रखते हैं। लेकिन असल में डर मौन से नहीं लगता। डर उस चीज़ से लगता है जो मौन में साफ़ दिखाई देने लगती है।
जब भीतर देखने की आदत बनती है
एक समय ऐसा आता है जब भागते-भागते थकान खुद रुकने को कहती है। तब मौन को चुना नहीं जाता, मौन बस घट जाता है। कोई निर्णय नहीं होता कि अब चुप रहना है। बस भीतर से हिलना बंद हो जाता है।
और उसी क्षण मौन का स्वाद बदल जाता है। जो पहले डराता था, वही अब सहज लगने लगता है।
मौन खाली नहीं होता
पहले मौन को खाली समझा गया था। अब दिखा कि मौन खाली नहीं है। वो तो इतना भरा हुआ है कि शब्द उसमें समा नहीं पाते। वहाँ संवेदना है, स्पष्टता है और बिना नाम का सुकून है।
सबसे अजीब बात यह है कि वहाँ कोई माँग नहीं होती। कुछ बनने की, कुछ पाने की या कुछ साबित करने की।
जब मन अपनी जगह पर लौटता है
मौन में मन खत्म नहीं होता। मन बस अपनी सही जगह पर लौट आता है। वो अब मालिक नहीं रहता और न ही सेवक बनता है। वो बस एक साधन रह जाता है।
विचार आते हैं, लेकिन आदेश नहीं देते। भावनाएँ उठती हैं, लेकिन दिशा तय नहीं करतीं। और यही संतुलन पहली बार भीतर उतरता है।
समय का दबाव ढीला पड़ना
मौन के साथ समय का रिश्ता भी बदल जाता है। घड़ी चलती है, लेकिन दौड़ नहीं लगाती। अब हर क्षण अगले क्षण के लिए सीढ़ी नहीं बनता।
क्षण अपने आप में पूरा लगता है। और इसी पूर्णता में जल्दबाज़ी गिर जाती है।
मौन में कोई लक्ष्य नहीं
मौन में कुछ हासिल करने का विचार नहीं होता। न शांति पाने की इच्छा रहती है और न आनंद पकड़ने की कोशिश। जो होता है, बस होता है।
और इसी बिना लक्ष्य के क्षेत्र में जीवन पहली बार हल्का दिखाई देता है।
बोलना भी बदल जाता है
मौन के बाद शब्द लौटते हैं, लेकिन पहले जैसे नहीं रहते। अब शब्द भरने के लिए नहीं आते, न बचाव करते हैं और न साबित करने की कोशिश करते हैं।
अब शब्द सिर्फ ज़रूरत पर आते हैं। और कई बार न आना ही सबसे सटीक उत्तर बन जाता है।
रिश्तों में नया स्पेस
जब मौन बोझ नहीं रहता, तो रिश्ते भी बदलने लगते हैं। अब हर चुप्पी गलत नहीं लगती और हर दूरी खतरा नहीं लगती। दूसरे को पूरा समझ लेने की ज़िद ढीली पड़ जाती है।
और इसी ढील में रिश्तों की निकटता और गहरी हो जाती है।
दुख और सुख का नया स्थान
दुख आता है, लेकिन कहानी नहीं बनाता। सुख आता है, लेकिन पकड़ की माँग नहीं करता। दोनों मौसम की तरह आते-जाते हैं।
क्योंकि अब जो स्थिर है, वो अनुभव नहीं बल्कि देखने वाला है।
जब मौन भी साधना नहीं रहता
एक बिंदु पर आकर मौन भी साधना नहीं रहता। न उसे बचाना पड़ता है और न ही लाना पड़ता है। जीवन जैसा है, वैसा ही स्वीकार्य हो जाता है।
और यही स्वीकृति सबसे गहरी शांति बन जाती है।
समापन
जब मौन भी बोझ नहीं रहा, तब समझ आया कि बोझ कभी मौन नहीं था। बोझ थी लगातार कुछ बनने की कोशिश। जब यह कोशिश थमी, तो मौन अपने आप घर जैसा लगने लगा।
और उसी घर में जीवन पहली बार बिना आवाज़ के पूरा सुनाई देने लगा।