मनुष्य का जीवन अक्सर सुधार की भावना से चलता है। कुछ ठीक करना है, कुछ बदलना है और कुछ बेहतर बनाना है। बचपन से यही सिखाया जाता है कि जैसे हो, वैसे पर्याप्त नहीं हो। अंक सुधरने चाहिए, आदतें सुधरनी चाहिए, स्वभाव और सोच दोनों सुधरने चाहिए।
धीरे-धीरे यह सुधार की भाषा भीतर उतर जाती है। और एक समय ऐसा आता है जब व्यक्ति बिना किसी स्पष्ट समस्या के भी खुद को अधूरा महसूस करने लगता है। जैसे कुछ कमी रह गई हो, जैसे अभी भी जीवन ठीक से घट नहीं रहा हो।
अधूरापन जो किसी कमी से नहीं आता
यह अधूरापन किसी विशेष दुख से नहीं आता। न किसी असफलता से और न किसी नुकसान से। बाहर से देखने पर सब कुछ ठीक चल रहा होता है। काम भी, रिश्ते भी और दिनचर्या भी।
फिर भी भीतर एक हल्की-सी बेचैनी बनी रहती है। जैसे कुछ छूट रहा हो, जैसे कुछ अभी भी सही नहीं हुआ हो। ध्यान से देखने पर यह साफ़ होता है कि यह बेचैनी जीवन से नहीं है। यह उस विचार से पैदा होती है कि जीवन को अभी और ठीक होना चाहिए।
सुधार की आदत कैसे बोझ बन जाती है
सुधार शुरुआत में उपयोगी लगता है। लेकिन जब हर अनुभव के बाद सुधार की माँग उठने लगती है, तो जीवन धीरे-धीरे एक प्रयोगशाला बन जाता है। हर भाव को जाँचा जाता है, हर प्रतिक्रिया को सुधारा जाता है और हर विचार पर निगरानी रखी जाती है।
इस पूरी प्रक्रिया में अनुभव को जीना पीछे छूट जाता है। व्यक्ति दुखी नहीं होता, लेकिन सहज भी नहीं होता। भीतर एक लगातार खिंचाव बना रहता है, जो दिखाई नहीं देता लेकिन थकाता बहुत है।
जब कोई पूछ बैठता है, अभी ठीक क्या नहीं है
कभी किसी साधारण-से क्षण में, शायद चाय पीते हुए या बस चलते हुए, अचानक यह सवाल उठता है कि अभी ठीक क्या नहीं है। न कोई स्पष्ट जवाब आता है और न ही कोई कारण दिखता है।
बस एक खाली-सा ठहराव आता है। और उसी ठहराव में पहली बार यह दिखाई देता है कि ठीक करने की इच्छा अपने आप चल रही थी, बिना पूछे और बिना किसी वास्तविक ज़रूरत के।
ठीक करने वाला कौन था
यहीं से एक सूक्ष्म-सी जाँच शुरू होती है। कोई साधना नहीं, कोई तकनीक नहीं। बस देखना। हर बार जब मन कहता है कि यह ठीक नहीं है, तब भीतर देखा जाता है कि यह कहने वाला कौन है।
और अजीब बात यह होती है कि कोई ठोस चीज़ नहीं मिलती। एक आवाज़ है, एक आदत है, एक पुरानी संरचना है। लेकिन कोई वास्तविक “सुधारक” नहीं मिलता जो सच में बैठा हो और सब संभाल रहा हो।
जब सुधारक थक जाता है
यह थकान शरीर की नहीं होती और न ही साधारण मानसिक थकान होती है। यह उस केंद्र की थकान होती है जो हर समय जिम्मेदारी उठाए हुए था। ठीक करने की, संभालने की और नियंत्रण रखने की।
जब यह थकान पूरी तरह महसूस हो जाती है, तब पहली बार सुधार अपने आप रुक जाता है। न कोई निर्णय लिया जाता है और न कोई संकल्प किया जाता है। बस ऊर्जा नहीं बचती।
जहाँ अनुभव बिना टिप्पणी के घटता है
इस रुकावट के बाद अनुभव वैसे ही आते हैं जैसे पहले आते थे। सुख आता है, दुख आता है, चिड़चिड़ापन आता है और शांति भी आती है। फर्क बस इतना होता है कि अब उनके साथ यह टिप्पणी नहीं जुड़ती कि यह ठीक नहीं है या यह नहीं होना चाहिए।
बिना टिप्पणी के अनुभव बहुत हल्के हो जाते हैं। वे टिकते नहीं, वे पहचान नहीं बनाते और जल्दी ही अपनी जगह छोड़ देते हैं।
जीवन का साधारण हो जाना
सबसे बड़ा बदलाव यही होता है कि जीवन अचानक बहुत साधारण लगने लगता है। न ऊँचा, न नीचा। और यह साधारणपन अब डराता नहीं।
पहले साधारण का मतलब नीरस लगता था। अब साधारण का मतलब बोझ-रहित हो जाता है। दिन वैसे ही कटते हैं और काम वैसे ही होते हैं, लेकिन भीतर कोई खिंचाव नहीं रहता कि यह सब किसी खास दिशा में जाना चाहिए।
रिश्तों में सुधार की ज़रूरत का गिरना
रिश्तों में भी यही बदलाव आता है। पहले हर रिश्ते में कुछ न कुछ ठीक करना होता था। किसी को समझाना, किसी को बदलना और किसी से उम्मीद करना।
अब रिश्तों को वैसे ही रहने दिया जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ आदर्श हो जाता है। इसका मतलब बस इतना है कि रिश्तों को अब सुधार की परियोजना नहीं बनाया जाता। और इसी कारण रिश्ते हल्के हो जाते हैं।
जहाँ जिम्मेदारी रहती है, बोझ नहीं
यहाँ एक बड़ी गलतफहमी टूटती है। सुधार छोड़ने का मतलब लापरवाही नहीं होता। काम अब भी जिम्मेदारी से होता है।
फर्क सिर्फ़ इतना होता है कि अब उसके पीछे खुद को साबित करने का दबाव नहीं होता। काम इसलिए होता है क्योंकि करना है, न कि इसलिए कि कुछ साबित करना है।
पहचान का ढीला पड़ना
जब ठीक करने की आदत गिरती है, तो पहचान भी अपने आप ढीली पड़ने लगती है। अब यह तय करना ज़रूरी नहीं लगता कि मैं कैसा इंसान हूँ।
कभी सख्ती आ जाती है, कभी नरमी। और दोनों ही स्थितियों में खुद को पकड़कर रखने की ज़रूरत नहीं होती। जीवन बहता रहता है।
जहाँ आत्मा कोई विषय नहीं रहती
यहाँ आत्मा कोई चर्चा का विषय नहीं बनती और न ही कोई लक्ष्य। वह बस अनुभव के पहले मौजूद रहती है।
कोई विशेष अनुभूति नहीं होती और कोई रोशनी नहीं दिखती। बस यह साफ़ होता है कि अनुभव घट रहा है और उसके लिए किसी सुधार की ज़रूरत नहीं है।
एक नई तरह की शांति
यह शांति उत्साह वाली नहीं होती और न ही बाहर से शांत दिखने वाली होती है। यह शांति बस टकराव की अनुपस्थिति होती है।
जीवन से लड़ाई नहीं रहती और खुद से भी लड़ाई नहीं रहती। और यही शांति सबसे स्थायी होती है, क्योंकि यह किसी परिस्थिति पर निर्भर नहीं होती।
अंत जैसा कुछ नहीं
यह कोई अंत नहीं है और न कोई मंज़िल। यह बस एक जगह है जहाँ भीतर कुछ भी ठीक करने की ज़रूरत नहीं लगती।
और उसी जगह से जीवन अपने आप ज़्यादा सच्चा लगने लगता है। न बेहतर, न ऊँचा। बस बिना खिंचाव के।