मनुष्य आमतौर पर भीतर रुकने की कोशिश करता है। ध्यान के नाम पर, साधना के नाम पर या समझ के नाम पर। वह मान लेता है कि कहीं कोई ऐसी जगह है जहाँ पहुँचते ही सब ठीक हो जाएगा। इसी मान्यता के साथ भीतर भी एक यात्रा शुरू हो जाती है, जिसमें हर दिन कुछ हासिल करने और कुछ सुधारने का दबाव बना रहता है।
लेकिन बहुत कम लोग यह देखते हैं कि जैसे ही कोशिश शुरू होती है, ठहराव असंभव हो जाता है। क्योंकि कोशिश अपने आप में गति है। और जहाँ गति है, वहाँ ठहराव सिर्फ़ एक कल्पना बनकर रह जाता है।
भीतर जाने की थकान
एक समय के बाद व्यक्ति यह महसूस करता है कि वह बाहर से ज़्यादा भीतर थक गया है। बाहर की दुनिया तो जैसी है वैसी ही रहती है, लेकिन भीतर लगातार कुछ ठीक करने का दबाव बना रहता है।
कभी लगता है कि ध्यान सही नहीं हो रहा, कभी लगता है कि समझ अधूरी है और कभी यह महसूस होता है कि अभी भी कुछ छूटा हुआ है। यह थकान किसी काम की नहीं होती। यह उस प्रयास की थकान होती है जो कभी पूरा नहीं हो सकता, क्योंकि जिसे पाना है, वह पाने से पहले ही मौजूद है।
सही अवस्था की कल्पना
मन बहुत चालाकी से एक आदर्श अवस्था बना लेता है। शांत, स्थिर, स्पष्ट और हल्की। फिर वह वर्तमान को उस आदर्श से तौलने लगता है।
अगर अभी बेचैनी है तो लगता है कि यह सही नहीं है। अगर उलझन है तो लगता है कि कुछ कमी है। अगर डर है तो लगता है कि अभी पहुँचे नहीं। यहीं से जीवन दो हिस्सों में बँट जाता है – जो है और जो होना चाहिए। और इस बँटवारे में जो है, वह हमेशा छोटा और अधूरा लगने लगता है।
जहाँ समझ भी बोझ बनने लगती है
शुरुआत में समझ राहत देती है। कुछ बातें साफ़ होती हैं और कुछ डर कम हो जाते हैं। लेकिन धीरे-धीरे समझ भी बोझ बनने लगती है।
हर अनुभव के साथ भीतर एक आवाज़ उठती है – इसका अर्थ क्या है, यह क्यों हो रहा है, यह किस दिशा में ले जाएगा। अनुभव घटने से पहले ही उसका विश्लेषण शुरू हो जाता है। और विश्लेषण में अनुभव दम तोड़ देता है, जैसे कोई पानी में उतरने से पहले उसकी गहराई नापता ही रह जाए।
एक साधारण सा क्षण
कभी-कभी बदलाव किसी बड़े अनुभव से नहीं आता। वह एक साधारण-से क्षण से आता है। जैसे सुबह उठकर कुछ देर खिड़की के पास खड़े रहना, बिना किसी ध्यान के, बिना किसी उद्देश्य के।
बस देखना कि बाहर रोशनी है, पक्षी हैं और आवाज़ें हैं। और भीतर कुछ भी ठीक करने की इच्छा नहीं उठती। वह क्षण कोई उपलब्धि नहीं लगता, लेकिन उसमें कोई कमी भी महसूस नहीं होती।
जब भीतर टिप्पणी नहीं आती
उस समय अजीब बात यह होती है कि मन चुप नहीं होता, लेकिन टिप्पणी नहीं करता। विचार आते हैं, लेकिन उन पर तुरंत कोई फैसला नहीं आता।
अच्छा, खराब, सही और गलत जैसे शब्द रास्ता भूल जाते हैं। और बिना इन शब्दों के भी जीवन ठीक-ठाक चल रहा होता है।
अपने आप का ढीला पड़ना
इस अवस्था में कोई घोषणा नहीं होती कि अब कुछ बदल गया है। बस इतना होता है कि “मैं” थोड़ा ढीला पड़ जाता है। अब हर अनुभव को अपनी कहानी बनाने की ज़रूरत नहीं लगती और हर भावना को अपनी पहचान बनाने की मजबूरी नहीं रहती।
दुख आता है, लेकिन दुखी होने वाला कोई ठोस केंद्र नहीं मिलता। सुख आता है, लेकिन उसे पकड़ने की हड़बड़ी नहीं होती।
जहाँ नियंत्रण खुद ही गिर जाता है
नियंत्रण छोड़ा नहीं जाता, नियंत्रण अपने आप गिर जाता है। क्योंकि उसे संभालने की ऊर्जा खत्म हो जाती है। जब व्यक्ति देख लेता है कि ज़िंदगी उसके बिना भी ठीक-ठाक चल रही है, तो नियंत्रण अप्रासंगिक हो जाता है।
साँस चल रही है, शरीर काम कर रहा है, बातें हो रही हैं और निर्णय बन रहे हैं। और इनमें से किसी के लिए भीतर बैठे किसी मालिक की ज़रूरत नहीं पड़ती।
असहजता जो डरावनी नहीं रहती
पहले असहजता आते ही घबराहट होती थी। अब असहजता बस एक अनुभव बन जाती है। न उसे हटाने की जल्दी रहती है और न उसे सही ठहराने की ज़रूरत।
असहजता भी अपना काम कर लेती है और चली जाती है, जैसे मौसम बदलता है।
जहाँ प्रश्न थककर बैठ जाते हैं
कभी ऐसा भी होता है कि प्रश्न उठना पूरी तरह बंद नहीं होते। लेकिन उन्हें पूछने की तात्कालिकता खत्म हो जाती है।
मैं कौन हूँ, जीवन क्या है, सत्य क्या है – ये प्रश्न अब किसी उत्तर की माँग नहीं करते। वे बस आते हैं और जगह पाकर शांत हो जाते हैं, जैसे बहुत बोलने के बाद कोई चुप हो जाए।
साधारण का लौट आना
सबसे बड़ा परिवर्तन यह होता है कि साधारण जीवन वापस आ जाता है, बिना महत्व खोए और बिना ऊब पैदा किए। चाय का स्वाद, चलते समय पैरों की गति और किसी का बिना वजह मुस्कुरा देना फिर से पूरे लगने लगते हैं।
कोई विशेष अर्थ नहीं होता, फिर भी अधूरापन नहीं लगता।
जहाँ कोई अंत नहीं बनता
इस स्थिति में व्यक्ति किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता। वह यह नहीं कहता कि अब उसे सब समझ आ गया है, क्योंकि समझने की ज़रूरत ही ढीली पड़ चुकी होती है।
जीवन अब किसी सिद्धांत से नहीं, सीधे अनुभव से चलने लगता है। और अनुभव को नाम देने की हड़बड़ी नहीं रहती।
एक शांत सा बिंदु
यहाँ कोई रोशनी नहीं चमकती और कोई विशेष शांति नहीं उतरती। बस इतना होता है कि जीवन से लड़ना बंद हो जाता है।
ना समर्थन रहता है, ना विरोध। और उसी में एक गहरी सरलता दिखाई देती है।
जहाँ कुछ साबित नहीं करना पड़ता
अब व्यक्ति को यह साबित नहीं करना पड़ता कि वह जागरूक है, समझदार है या अलग है। क्योंकि साबित करने की ज़रूरत वहीं होती है जहाँ भीतर असुरक्षा होती है।
और यहाँ असुरक्षा को संभालने वाला कोई केंद्र नहीं बचता।
अंत जैसा कुछ नहीं
यह कहानी भी किसी अंत पर नहीं पहुँचती, क्योंकि अंत की ज़रूरत वहीं होती है जहाँ यात्रा मानी जाती है। यहाँ कोई यात्रा नहीं है।
बस जीवन का धीरे-धीरे हल्का हो जाना। न बेहतर, न बदतर। बस कम बोझिल।
और शायद यही सबसे गहरी बात है कि जब भीतर ठहरने की कोशिश भी गिर जाती है, तभी जीवन अपने आप ठहर जाता है। बिना कहे, बिना दिखाए।