जब भीतर कोई दिशा माँगना बंद कर देता है

मनुष्य का जीवन अक्सर दिशा की तलाश में बीतता है। कहाँ जाना है, क्या बनना है और किस तरफ बढ़ना सही है-ये प्रश्न भीतर लगातार चलते रहते हैं। बचपन से ही अगला कदम क्या होगा, इस पर ध्यान सिखाया जाता है। पढ़ाई के बाद क्या, काम के बाद क्या और एक लक्ष्य के बाद अगला लक्ष्य क्या-जैसे जीवन तब तक अधूरा है जब तक उसे किसी दिशा में बाँध न दिया जाए।

धीरे-धीरे दिशा एक सुरक्षा बन जाती है। दिशा होने का अर्थ होता है कि मैं भटका नहीं हूँ। और इसी सुरक्षा के भरोसे जीवन आगे बढ़ता रहता है।


दिशा का बोझ

समय के साथ दिशा खोजने की यही आदत बोझ बन जाती है। क्योंकि हर क्षण को किसी भविष्य से जोड़ना पड़ता है। अगर आज का दिन अच्छा है, तो मन पूछता है कि इससे आगे क्या होगा। अगर दिन खराब है, तो डर उठता है कि कहीं यही स्थायी न हो जाए।

इस तरह वर्तमान कभी पूरा नहीं होता। वह हमेशा किसी और जगह के लिए सीढ़ी बना रहता है। जो है, वह सिर्फ़ इसलिए सहा जाता है ताकि कहीं और पहुँचा जा सके।


एक साधारण सा ठहराव

कभी-कभी किसी थके हुए दिन में या किसी शांत शाम में अचानक दिशा का सवाल उठता ही नहीं। न इसलिए कि उत्तर मिल गया है, बल्कि इसलिए कि सवाल ही अर्थहीन लगने लगता है।

यह क्षण बहुत हल्का होता है। इतना हल्का कि मन उसे पकड़ भी नहीं पाता। बस थोड़ी देर के लिए भीतर से पूछना रुक जाता है।


दिशा पूछने वाला कौन था

जब दिशा का प्रश्न नहीं उठता, तब ध्यान उस पर जाता है जो हमेशा पूछता था। कौन पूछ रहा था कि मुझे कहाँ जाना है। किसे भरोसा चाहिए था और किसे आश्वासन चाहिए था।

यहाँ कोई ठोस उत्तर नहीं मिलता। बस एक आदत दिखाई देती है, एक पुराना ढाँचा जो अनिश्चितता से बचने के लिए भविष्य का सहारा लेता रहा।


आदत जो सुरक्षा चाहती थी

दिशा इसलिए नहीं माँगी जाती थी कि जीवन खो गया था। दिशा इसलिए माँगी जाती थी क्योंकि अनिश्चितता असहज लगती थी। मन अनिश्चितता में खुद को खोया हुआ महसूस करता है, इसलिए वह भविष्य की कल्पना पकड़ लेता है।

लेकिन जब भविष्य की पकड़ ढीली पड़ती है, तो अनिश्चितता भी उतनी डरावनी नहीं रहती। वह बस एक खुला स्थान बन जाती है।


जहाँ वर्तमान पूरा लगता है

इस अवस्था में वर्तमान पहली बार पूरा लगता है। न इसलिए कि सब कुछ अच्छा है, बल्कि इसलिए कि उसे किसी और जगह नहीं भेजा जा रहा। दुख है तो भी पूरा है, सुख है तो भी पूरा है।

अब हर अनुभव को किसी निष्कर्ष तक पहुँचाने की जल्दी नहीं रहती। जो है, वह अपने आप में पर्याप्त लगता है।


काम बिना मंज़िल के

काम अब भी होता है, लेकिन उसके पीछे कोई अंतिम मंज़िल चिपकाई नहीं जाती। पहले काम भविष्य के लिए होता था, अब काम बस काम होता है।

और यही फर्क काम को हल्का कर देता है। प्रयास बना रहता है, लेकिन दबाव नहीं रहता।


रिश्ते बिना दिशा के

रिश्तों में भी यही बदलाव आता है। अब यह तय करने की ज़रूरत नहीं रहती कि यह रिश्ता कहाँ जा रहा है। साथ है तो है और दूरी है तो है।

रिश्ता अब किसी दिशा का प्रमाण नहीं बनता। वह बस एक घटना बन जाता है, जो जैसी है वैसी ही रहने दी जाती है।


असफलता का डर कहाँ गया

जब दिशा नहीं माँगी जाती, तो असफलता का अर्थ भी बदल जाता है। अब कुछ गलत हो जाने से जीवन की पूरी कहानी नहीं टूटती।

क्योंकि कहानी अब किसी एक रास्ते पर टिकी नहीं होती। गलती एक घटना रह जाती है, पहचान नहीं बनती।


जहाँ निर्णय अपने आप बनते हैं

निर्णय अब भी बनते हैं, लेकिन उनके साथ भारीपन नहीं जुड़ता। अब यह साबित नहीं करना होता कि निर्णय सही है।

जो होता है, वही होता है। और इसी सहजता से निर्णय साफ़ होने लगते हैं।


पहचान का ढीला होना

जब दिशा का आग्रह गिरता है, तो पहचान भी अपने आप ढीली पड़ने लगती है। अब यह तय करना ज़रूरी नहीं रहता कि मैं कौन हूँ और क्या बनूँगा।

पहचान अब कोई स्थिर वस्तु नहीं रहती। वह एक बहती हुई प्रक्रिया बन जाती है, जो समय के साथ बदलती रहती है।


अस्तित्व के साथ नया संबंध

यहाँ अस्तित्व को समझने की कोशिश नहीं होती और न ही उससे लड़ाई होती है। बस एक अजीब-सा भरोसा पैदा होता है कि जो घट रहा है, वह अपने आप संभल रहा है।

जीवन अब किसी योजना पर नहीं, अपने स्वाभाविक प्रवाह पर चलता दिखता है।


भरोसा जो किसी विचार से नहीं आता

यह भरोसा किसी सिद्धांत से नहीं आता। यह अनुभव से आता है। अनुभव से कि जीवन बिना निर्देश के भी चल रहा है और शायद पहले से ज़्यादा सहजता से।

और यह भरोसा किसी तर्क का परिणाम नहीं होता, बस धीरे-धीरे स्पष्ट होता है।


शांति जो दिखती नहीं

यहाँ कोई बड़ी शांति दिखाई नहीं देती और न कोई विशेष आनंद। बस संघर्ष की अनुपस्थिति होती है।

और यही अनुपस्थिति सबसे गहरी शांति बन जाती है।


अंत जैसा कुछ नहीं

यह भी कोई अंत नहीं है और न कोई सिद्धि। यह बस एक जगह है जहाँ भीतर कोई दिशा माँगना बंद कर देता है।

और उसी जगह से जीवन बिना नक़्शे के भी चलने लगता है-धीरे, स्वाभाविक और बिना अतिरिक्त बोझ के।


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