ये उस दिन की बात नहीं है जब किसी ने ध्यान करना शुरू किया।
ना किसी किताब ने रास्ता दिखाया।
ना किसी गुरु की आवाज़ भीतर गूँजी।
ये उस समय की बात है जब भीतर ये जल्दबाज़ी ही थक गई
कि जीवन को समझना ज़रूरी है।
अब तक सब कुछ समझ के सहारे टिका हुआ था।
हर अनुभव को किसी अर्थ में बदलना था।
हर स्थिति को किसी निष्कर्ष तक पहुँचाना था।
समझ एक सुरक्षा बन गई थी।
और सुरक्षा धीरे-धीरे बोझ बन गई।
समझ जो मदद नहीं, पकड़ बन गई
पहले समझ से भरोसा मिलता था।
अब समझ से ही दूरी बनने लगी।
किसी दुख को समझा गया,
तो वो दुख स्थायी हो गया।
किसी सुख को समझा गया,
तो उसके चले जाने का डर पैदा हो गया।
समझ हर अनुभव के पीछे
एक कहानी खड़ी कर देती थी।
और कहानी जितनी साफ़ होती,
अनुभव उतना दूर हो जाता।
मन की सबसे पुरानी आदत
मन को अनिश्चितता से डर लगता है।
और समझ अनिश्चितता को ढक देती है।
इसलिए मन बार-बार पूछता है,
ये क्यों हुआ।
इसका मतलब क्या है।
अब आगे क्या होगा।
पर शायद ही कभी ये देखा जाता है
कि सवाल पूछना भी एक आदत है।
और हर आदत की तरह
इसका भी अपना भार होता है।
जब प्रश्नों ने भी आराम माँगा
एक समय आया जब सवाल उठते तो थे,
पर उनमें पहले जैसी ताक़त नहीं थी।
सवाल आते,
पर उनके पीछे दौड़ने का मन नहीं करता।
पहले सवाल जीवन चलाते थे।
अब सवाल बस आते थे,
और चले जाते थे।
जैसे कोई पुरानी मशीन
जो अब आवाज़ तो करती है,
पर दिशा नहीं देती।
अनुभव जो बिना नाम के आने लगे
अब अनुभव आने लगे
बिना तुरंत नाम माँगे।
दुख आया,
तो वो दुख ही रहा।
सुख आया,
तो वो सुख ही रहा।
ना किसी ने पूछा
ये अच्छा है या बुरा।
ना किसी ने कहा
इसे पकड़ लो या छोड़ दो।
अनुभव पहली बार
अपने पूरे आकार में दिखने लगे।
अस्तित्व जो स्पष्टीकरण नहीं माँगता
जीवन कभी स्पष्टीकरण नहीं माँगता।
वो बस घटता है।
पर मन हर बार
उस पर टिप्पणी जोड़ देता है।
अब टिप्पणियाँ धीमी पड़ गईं।
घटना हुई।
प्रतिक्रिया हुई।
पर बीच में कहानी नहीं बनी।
और बिना कहानी के भी
जीवन अधूरा नहीं लगा।
जब भीतर कोई निर्णायक नहीं मिलता
पहले भीतर कोई बैठा था
जो हर चीज़ तय करता था।
ये सही है।
वो गलत है।
ये करना चाहिए।
वो नहीं करना चाहिए।
अब वो निर्णायक दिखाई नहीं देता।
निर्णय होते हैं।
पर निर्णयकर्ता नहीं दिखता।
और बिना निर्णयकर्ता के
जीवन बिखर नहीं रहा।
बल्कि पहले से ज़्यादा सरल हो गया है।
भावनाएँ जो अब आदेश नहीं देतीं
पहले भावनाएँ आदेश देती थीं।
गुस्सा आया, तो कुछ करना ज़रूरी था।
डर आया, तो बचना ज़रूरी था।
खुशी आई, तो उसे पकड़ना ज़रूरी था।
अब भावनाएँ आती हैं।
और जाती हैं।
ना उन्हें रोका जाता है।
ना उनके पीछे भागा जाता है।
और बिना नियंत्रण के भी
कोई अराजकता नहीं फैलती।
अकेलेपन का नया रूप
अब अकेलापन डराता नहीं।
क्योंकि अब अकेलापन खाली नहीं लगता।
पहले अकेलापन मतलब कमी।
अब अकेलापन मतलब जगह।
ऐसी जगह
जहाँ कुछ साबित नहीं करना।
जहाँ कुछ जोड़ना नहीं।
जहाँ कुछ सुधारना नहीं।
बस होना।
समय जो अब दबाव नहीं बनाता
समय पहले एक दौड़ था।
पीछे रह जाने का डर।
आगे न बढ़ पाने की चिंता।
अब समय चलता है,
पर धक्का नहीं देता।
घड़ी चलती है,
पर भीतर कोई हड़बड़ी नहीं।
और बिना हड़बड़ी के
हर काम ज़्यादा साफ़ हो जाता है।
आध्यात्मिकता जो कुछ नहीं सिखाती
पहले आध्यात्मिकता से उम्मीद थी
कि वो कुछ सिखाएगी।
अब ये साफ़ हुआ
कि आध्यात्मिकता कुछ नहीं सिखाती।
वो बस वो सब हटाती है
जो अनावश्यक था।
झूठी ज़िम्मेदारियाँ।
झूठे लक्ष्य।
झूठी पहचानें।
और जब ये सब गिरता है,
तो जो बचता है
उसे किसी नाम की ज़रूरत नहीं रहती।
जहाँ प्रयास भी थक जाता है
एक समय ऐसा भी आता है
जब प्रयास करना भी बोझ लगने लगता है।
अच्छा बनने का प्रयास।
सही जीने का प्रयास।
जागरूक होने का प्रयास।
और उसी थकान में
एक नई स्पष्टता उभरती है।
कि शायद जो होना है
वो बिना प्रयास के भी हो सकता है।
स्वयं की खोज जो स्वयं को मिटा देती है
स्वयं को खोजते-खोजते
ये दिखा कि जिसे खोजा जा रहा था
वो कभी वस्तु था ही नहीं।
खोज ने खुद को ही
अनावश्यक साबित कर दिया।
और ये बात
किसी निष्कर्ष की तरह नहीं आई।
ये बस
एक गिरावट की तरह आई।
जहाँ खोज अपने आप
ढह गई।
जहाँ कोई केंद्र नहीं मिलता
मन हर चीज़ के पीछे
कोई केंद्र ढूँढता है।
कोई नियंत्रक।
कोई संचालक।
कोई मालिक।
पर जैसे-जैसे देखा गया,
वैसे-वैसे साफ़ हुआ
कि घटनाएँ हैं,
पर उनका कोई स्थायी मालिक नहीं।
और बिना मालिक के भी
जीवन बिखर नहीं रहा।
बल्कि पहले से ज़्यादा सहज है।
समझ जो पूरी नहीं होती
यहाँ कोई अंतिम समझ नहीं मिलती।
कोई पूर्ण ज्ञान नहीं मिलता।
बस इतना साफ़ होता है
कि जीवन को पूरी तरह समझ लेने की चाह
ही जीवन से दूरी बनाती थी।
और शायद
पूरा न समझ पाना
ही सबसे ईमानदार स्थिति है।
अंत जो कोई निष्कर्ष नहीं देता
ये लेख किसी निष्कर्ष पर खत्म नहीं होता।
क्योंकि अब निष्कर्ष की ज़रूरत नहीं लगती।
बस इतना दिखा
कि जीवन को समझने की जल्दी
जब गिर जाती है,
तो जीवन अपने आप
ज़्यादा साफ़ दिखाई देने लगता है।
ना बेहतर।
ना बदतर।
बस बिना बोझ के।
और शायद
यही गहराई है।