शहर हमेशा की तरह जाग रहा था।
लोग निकल रहे थे, दुकानें खुल रही थीं, आवाज़ें एक-दूसरे पर चढ़ रही थीं।
सब कुछ चल रहा था, पर उस सुबह कुछ अलग था।
वो आदमी खिड़की के पास खड़ा था।
घड़ी सामने टंगी थी, पर वो उसे नहीं देख रहा था।
समय टिक-टिक कर रहा था, पर भीतर कोई टिक-टिक नहीं थी।
उसे अचानक लगा,
जैसे समय बाहर चल रहा है,
पर भीतर कुछ थम गया है।
डर नहीं था।
हैरानी भी नहीं।
बस एक अजीब सी स्पष्टता थी,
कि अभी कुछ भी जल्दी में नहीं है।
जब मन ने सवाल पूछना छोड़ दिया
आमतौर पर उसका मन हर सुबह सवालों से भर जाता था।
आज क्या करना है।
क्या सही है।
क्या गलत हो सकता है।
पर उस दिन मन चुप था।
सवाल नहीं थे।
और सवाल न होना,
उसे अजीब नहीं लग रहा था।
पहली बार उसे ये समझ में आया
कि सवाल भी एक आदत होते हैं।
और आदत थक जाए,
तो गिर जाती है।
उसने खुद से पूछा नहीं,
कि ऐसा क्यों हो रहा है।
क्योंकि पूछने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई।
चलते कदम, बिना दिशा के
वो बाहर निकला।
सड़क वही थी।
लोग वही थे।
पर चलने में अब कोई उद्देश्य नहीं था।
ना वो कहीं पहुँचने जा रहा था,
ना कहीं से बच रहा था।
पहले चलना एक साधन था।
अब चलना बस चलना था।
उसने देखा,
पेड़ वैसे ही खड़े हैं,
पर अब वो सजावट नहीं लग रहे थे।
हवा चल रही थी,
पर किसी संदेश के साथ नहीं।
सब कुछ घट रहा था,
बिना उसके लिए बने होने के।
देखना, बिना नाम लगाए
एक दुकान के बाहर खड़ा होकर उसने लोगों को देखा।
पहले वो कहता था,
ये आदमी ऐसा है।
वो औरत वैसी है।
आज नाम नहीं बने।
आज श्रेणियाँ नहीं बनीं।
चेहरे दिखे,
पर उनके साथ कहानी नहीं जुड़ी।
और पहली बार उसे महसूस हुआ,
कि कहानी जोड़ना ही थकाता था।
देखना कभी थकाता नहीं।
जब स्मृति काम नहीं आई
एक पुरानी जगह से वो गुज़रा।
पहले यहाँ से गुजरते ही
यादें आ जाती थीं।
आज यादें आईं,
पर रुकी नहीं।
जैसे उन्हें भी समझ आ गया हो
कि अब सलाह की ज़रूरत नहीं है।
यादें बोझ नहीं बनीं।
और बोझ न बनना,
किसी जीत जैसा नहीं लगा।
बस सामान्य था।
निर्णय जो बनना ही भूल गए
फोन बजा।
एक सवाल था,
जिसका जवाब पहले तुरंत बन जाता था।
आज जवाब नहीं बना।
और जवाब न बनना,
किसी कमी जैसा नहीं लगा।
उसने कहा,
“देखता हूँ।”
फोन रख दिया।
और भीतर कुछ भी अधूरा नहीं लगा।
उसे पहली बार दिखा,
कि हर प्रश्न का उत्तर देना,
जीवन की ज़रूरत नहीं है।
कभी-कभी प्रश्न
खुद ही अपना रास्ता बदल लेते हैं।
जब पहचान ढीली पड़ती है
दोपहर को उसने शीशे में खुद को देखा।
चेहरा वही था।
आँखें वही थीं।
पर भीतर से कोई परिचय नहीं उठा।
पहले वो कहता था,
मैं ऐसा हूँ।
मैं वैसा हूँ।
आज कोई वाक्य नहीं बना।
और पहचान न बनना,
खालीपन नहीं लगा।
बल्कि हल्कापन लगा।
जैसे कोई भारी कपड़ा
अपने आप उतर गया हो।
जहाँ नियंत्रण की ज़रूरत नहीं रही
शाम को अचानक बारिश आ गई।
पहले वो चिढ़ जाता।
योजना बदल जाती थी।
आज बारिश बस बारिश थी।
ना खराब।
ना अच्छी।
उसे ये देखकर अजीब सुकून मिला
कि चीज़ों को ठीक या गलत कहना,
भी एक बोझ है।
जब बोझ गिरता है,
तो स्थिति नहीं बदलती,
देखने वाला बदल जाता है।
अकेलापन, बिना भारी हुए
रात हुई।
कमरा शांत था।
पहले ऐसी शांति
अकेलापन बन जाती थी।
आज शांति,
शांति ही रही।
कोई आवाज़ चाहिए थी,
ऐसा नहीं लगा।
उसे समझ आया
कि अकेलापन तब लगता है
जब भीतर कुछ चाहिए होता है।
जहाँ कुछ चाहिए ही नहीं,
वहाँ अकेलापन भी टिक नहीं पाता।
जब जीवन कोई प्रश्न नहीं रहा
बिस्तर पर लेटे हुए
उसने जीवन के बारे में नहीं सोचा।
न ये कि जीवन क्या है।
न ये कि वो क्या कर रहा है।
जीवन एक समस्या नहीं लग रहा था
जिसे हल किया जाए।
जीवन बस घट रहा था।
और वो उसमें शामिल था,
बिना कोशिश के।
सुबह, जो नई नहीं थी
अगली सुबह भी आई।
सूरज उगा।
पर उसे ऐसा नहीं लगा
कि कुछ नया शुरू हुआ है।
और यही सबसे नई बात थी।
पहले हर सुबह
एक शुरुआत होती थी।
अब बस निरंतरता थी।
कोई कहानी आगे नहीं बढ़ रही थी।
कोई अध्याय बंद नहीं हुआ था।
जहाँ कुछ भी हासिल नहीं हुआ
उस दिन उसने कुछ पाया नहीं।
कोई ज्ञान नहीं।
कोई अनुभव नहीं।
पर कुछ छूटा जरूर था।
जल्दी।
दबाव।
और भीतर बैठा वो व्यक्ति
जो हर चीज़ को संभालना चाहता था।
अंत, जो अंत नहीं है
ये कहानी वहाँ खत्म नहीं होती।
क्योंकि वहाँ कोई निष्कर्ष नहीं बना।
बस इतना हुआ
कि एक दिन भीतर का समय थक गया।
और जब समय थक जाता है,
तो जीवन दौड़ना बंद कर देता है।
वो रुकता नहीं।
बस हल्का हो जाता है।
और शायद
यही सबसे गहरी बात है।
कि जब कुछ भी पाने की इच्छा नहीं रहती,
तब जीवन पहली बार
अपना असली रूप दिखाता है।
बिना आवाज़ के।
बिना दावा किए।
बस मौजूद रहकर।